शादी-विवाह

मानव समाज की ईश्वर ने पुरुष और स्त्री के रूप में विभाजित कर पृथ्वी पर मानव समाज को स्थापित रखने जन्म–मरण के श्रृंखला को कायम रखने की संरचना की है. ‘हो’ समाज में स्त्री पुरुषों के यौन सम्बन्ध से सन्तानोत्पति होती है पर यौन सम्बन्ध में स्वतंत्रता नहीं होती है. समाज में अनुशासन बनाए रखने समाज को संगठित कर सही दिशा देने के लिए प्रत्येक समाज में कुछ नियम बने होते हैं, जिसके उलंघन का सामाजिक तथा कानूनी तौर पर दंडनीय माना जाता है, शादी–विवाह, सामाजिक बन्धन का यह नियम मनुष्यों को पशुओं से अलग करता है.

इन्हीं सामाजिक नियमों के तहत शादी-विवाह भी यौन सम्बन्ध में सामाजिक मान्यता का एक रूप है. शादी-विवाह के द्वारा स्त्री–पुरुष के यौन सम्बन्ध को पति–पत्नी के रूप में सामाजिक पहचान मिलती है. यह परिवार को स्थाई बन्धन में बाँधने का एक रूप है, तथा इस बन्धन को पवित्र रिश्ता माना जाता है. विवाह के द्वारा पुरुष स्त्री पति पत्नी के बन्धन में बाँधने के पश्चात् एक-दूसरे के सुख-दुःख, पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाते हैं. ‘हो’ समाज में भी विवाह एक आवश्यक अनुष्ठान माना गया है. यह ‘हो’ समाज में सम्बन्धों को सही दिशा देने, परिवारों को नियमित करने, वंश को बढ़ाने तथा स्त्री-पुरुषों के सम्बन्धों को पति–पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्रदान करता है. ‘हो’ समाज में विवाह के कई तरीके हैं.
(१ ) आदर्श विवाह – समाज के लोगों के द्वारा शुरु से अंत तक सामाजिक परम्पराओं का अनुकरण करते हुए कराए जाने वाला विवाह.
(२ ) प्रेम विवाह (अपसराए आंदी) – युवक एवं युवती के द्वारा इच्छा से विवाह.
(३ ) ओपोर तिपी विवाह – युवक के द्वारा जबरदस्ती बलपूर्वक युवती को ले जा कर विवाह.
(४ ) विधवा विवाह – निसंतान विधवा का पति के छोटे भाई से विवाह.

‘हो’ समाज में बाल विवाह की प्रथा नहीं है. युवक और युवती जब २० के वर्ष विवाह ऊपर आ जाते है तभी इन्हें विवाह के योग्य समझा जाता है. पहले जमाने में यह कहा जाता था कि लड़का तभी लायक माना जाता है जब वह हल बनाना, खटिया बुनना तथा गृहस्थी के अन्य कार्यों में निपुण हो. इसी तरह लड़कियाँ घर और खेत के कामकाज को समझ ले तथा समाज के छोटे बड़ों को मान सम्मान देना सीख ले. यह भी कहा जाता था कि गुणी लड़की वही है जिसकी कोहनी से हथेली तक खेती के काम करते हुए निशान बने हुए हों.

‘हो’ समाज में महिलाओं को प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता है और दहेज का प्रचलन बिलकुल नहीं है. दहेज लेने वाला लड़का का परिवार समाज में नीचा समझा जाता है तथा इन्हें असामाजिक माना जाता है. दहेज देने वाले लड़की के पारिवारिक कमी, परिवार में या लड़की में कोई खोट समझा जाता है.

इस तरह दहेज का प्रथा बिलकुल नहीं है दहेज लेने वाला तथा देने वालों के सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट आती है. ‘हो’ समाज में पुरुष को ही पंचो के द्वारा तय रकम युवती के परिवार को देना पड़ता है. इस तरह लड़कियाँ अन्य समाज की तरह माता पिता के लिए परेशानियों का कारण नहीं बनती है और ना अन्य समाज की तरह दहेज के लिए इन पर अत्याचार ही होता है. ‘हो’ समाज में शादी के पहले यौन सम्बन्ध स्थापित करना वर्जित होता है. ‘हो’ समाज के लड़के तथा लड़कियाँ स्वतंत्र तथा स्वछंद रहते हुए भी इस नियम का कठोरता से पालन करते हैं. ऐसा करने पर उन्हें तथा उस परिवार को सामाजिक रूप से अपमानित होने का भए बना रहता है. शादी – विवाह भी अपने समाज में करने पर ही सामाजिक स्वीकृति मिलती है.

जब अन्य समाज की लड़की से कोई लड़का शादी कर लेता है तो उस विवाहित लड़की को आदिंग में, जहाँ परिवार के पुर्वजों की आत्माओं को प्रतिस्थापित किया गया होता है, घुसने तथा पूजा पाठ करने का अधिकार जीवनोपरांत प्राप्त नहीं होता है. पर सन्तान को स्वतः यह अधिकार प्राप्त हो जाता है.

‘हो’ समाज में एक से अधिक पत्नी रखने की भी मान्यता है. पर इसके लिए पहली पत्नी से पति को सन्तान सुख प्राप्त नहीं होने या पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं होने स्थिति में, पत्नी तथा परिवार जनों की सलाह एवं सहमति से वह दूसरा विवाह कर सकता है. वंश परम्परा को कायम रखने के लिए उसे समाज के लोगों के द्वारा सामाजिक स्वीकृति मिलती है.

आदर्श विवाह – ‘हो’ समाज में शादी – विवाह दूसरे हागा (गोत्र) में ही किया जाता है. सम्बन्ध दूसरे गाँव से ही करने का प्रयास किया जाता है. दूसरे समाज की तरह ही ‘हो’ समाज में भी मध्यस्थता करने वाले की आवश्यकता होती है. सम्बन्ध स्थापित या बनाने का प्रयास लड़के वालों की ओर से ही किया जाता है. लड़की वालों की तरफ से शादी की पहल कभी भी नहीं की जाती (जिसकी वजह से कई बार लड़की की शादी नहीं हो पाती और लड़की ताउम्र माता-पिता के घर पर ही रह जाती है. गैर शादीशुदा लड़के या लड़की को “दिन्डे” कहा जाता है.) लड़के वालों को जब किसी गाँव में योग्य कन्या की जानकारी होती है तो किसी मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति का सहारा लेकर लड़के वालों की ओर से लड़की को शादी हेतु देने या ना देने का पता किया जाता है. जब इन्हें यह मालुम होता है कि सम्बन्ध बन सकता है तो किसी दिन लड़के वालों की ओर से (गाँव से) तीन–चार व्यक्ति लड़की के घर जाते हैं. लड़की वाले सामाजिक तरीके से उनका आदर सत्कार करते हैं. लड़के के गाँव से आए लोग उचित अवसर निकाल कर आने का उद्देश्य अप्रत्यक्ष तरीके से जाहिर करते हैं. जैसे- आपलोगों के इलाके में नये–नये सुन्दर-सुन्दर पत्तियाँ नजर आई हैं. हमारे इलाके में नहीं हैं तथा हमें इनकी काफी आवश्यकता है. हमलोग इसी चाहत में आए हैं. दूसरी तरह से – “नेन पा रे बुगीन-बुगीन रानू को बेटाओवा – हिते रानू को ले नमतना”. तीसरे तरह से – “नेन पा रे बलेए–बलेए पेटाअः होन को ले नेलनम तना, एमालेरेदो पे हिते पुंजी लगिड कीरिंग कोवा”.

जब घर पर बहुत सारी लड़कियां होती है तो उनलोगों से पूछा जाता है कि पत्तियाँ तो बहुत है ऊपर की डाल पर भी नीचे की डाल पर भी आपलोग किस डाल की पत्तियों की बात करते हैं. ऊपर की डाल के पत्तियों का अर्थ – छोटी लड़की. नीचे की डाल पर की पत्ति का अर्थ – बड़ी लड़की होती है.

इस तरह बातचीत में जब आपसी सहमति हो जाती है तो अगले कार्यक्रम के लिए समय तय होता है. इस बीच लड़की वाले लड़के, तथा लड़के के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, हैसियत का पता लगा कर सहमति या असहमति की सूचना मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति के द्वारा लड़के वालों को भेज देते हैं. सहमति होने पर लड़के पक्ष की ओर से बापला का दिन निश्चित कर लड़की वालों को सूचित कर दिया जाता है.
बापला – हो जाति में बापला दो परिवारों में होने वाले नए सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिए किया जाने वाला एक रस्म है.
पहले लड़की के घर पर बापला होता है. लड़के के घर गाँव से लोग लड़की के घर निश्चित तिथि या दिन में जाते है. पहले इनकी संख्या अनिश्चित भी हुआ करती थी, जिससे काफी आर्थिक दबाव पड़ता था पर अब आदिवासी हो समाज महासभा के द्वारा इस संख्या को अधिक से अधिक १५ (पुरुष ओर औरतों की संख्या मिलाकर) किया गया है.



ये लोग निश्चित तिथि को (इस तिथि का निर्धारण दोनों पक्षों की सहमति से की गई होती है) आवश्यक सामाग्रियों (चावल, हंडिया, खस्सी, इत्यादि) के साथ लड़की के घर पहुँचते हैं. लड़की के लिए साबुन तथा तेल इत्यादि. प्रतिदिन व्यवहार में आने वाली वस्तुएं भी वे भेंट देने हेतु साथ ले जाते हैं. लड़की के घर पहुँचने पर घर गाँव के लोग उनका सम्मान स्वागत करते हैं. इस अवसर पर गाँव के लोगों के अलावा लड़की वालों के रिश्तेदार आदि भी आमंत्रित रहते हैं. लड़की वालों एवं आमंत्रित सभी परिवारों के लिए झोपड़ीनुमा (जामडा) जगह की व्यवस्था कर दी जाती है.

आगन्तुको को लोटा से पानी दिया जाता है. पैर धुलाने के पश्चात् पुरुषों को बैठाने के उपरान्त सूखे साल के पत्ते पर लिपटा तम्बाकू पीने हेतु दिया जाता है, सभी उसे प्रेम से ग्रहण करते हैं. हो जाति में खैनी का रिवाज नहीं है. इस अवसर पर बीड़ी या सिगरेट का प्रयोग नहीं किया जाता है. इसके पश्चात् उन्हें इन्तजाम के अनुसार नाश्ता पानी कराया जाता है. उस शाम का खाना–पीना घर पर ही व्यवस्था हो जाती है या संख्या ज्यादा होने पर उन्हें सामाग्री दे दिया जाता है. वे अपने झोपड़ी में स्वयं अपने खाने–पीने की सामाग्री तैयार कर लेते हैं. दूसरे दिन सुबह के कार्यों से निबृत हो कर दोनों पक्ष के बुजुर्ग आपस में बैठते हैं. यह बैठकी घर से थोड़ा हट कर किसी छायादार जगह पर होती है.

वहाँ दो चटाई (जाटी) बिछाई जाती है. यह बैठकी कुर्सी बेंच इत्यादि में कदापि नहीं होती है इसके लिए जाटी का ही प्रयोग किया जाता है एक चटाई पर लड़के वाले तथा दूसरे पर लड़की वाले बैठते हैं. चटाई (जाटी) हमेशा निश्चित दिशा (लम्बाई का छोर पूरब पश्चिम की दिशा में करके) बिछाया जाता है. उत्तर दक्षिण दिशा में बिछाना अशुभ माना जाता है तथा इस तरह बिछाने से कहते है, समझौता नहीं होती है कहीं न कहीं बाधा उत्पन होता है.

सर्वप्रथम ग्रह (ए़रे) की चर्चा होती है. लड़के वाले इस कार्य में आने के दौरान, रास्ते में किसी तरह का अनहोनी (बिना हवा के गांछ –वृक्ष की डालियों का टूटना, बिल्ली का रास्ता काटना, बैलों का आपस में लड़ना. साँप इत्यादि का रास्ते में पड़े रहना या इसी तरह के अन्य –अन्य बातें) को देखते हैं तो इन बातों की चर्चा यहाँ करते हैं. एक व्यक्ति इन सब बातों की विवरणी एक-एक कर लिखता है. एरे की यह जानकारी लड़के गाँव से यहाँ आने वाले तथा इस आयोजन में सम्मलित होने हेतू लड़के के रिश्तेदार अपने घर से लड़के के घर जाने के दौरान तथा यहाँ शामिल होने तक में देखे गए एरे की चर्चा करते हैं. पुरुष तथा महिलाएं सभी इसकी चर्चा करते है. अगर एरे काफी अशुभ हो जिसे पूजा पाठ से भी समाप्त नहीं किया जा सकता हो यानि विवाह के पश्चात् किसी घटना दुर्घटना होने की आशंका हो और होने वाले नव दम्पत्ति के लिए अच्छा नहीं हो तो दोनों पक्षों के सहमति तथा प्रेम से बात समाप्त कर दी जाती है.

ऐसी कोई बात नहीं है तो सम्बन्धों को बनाए जा सकने के “एरे” हो तो “गोंनोंग सिड” यानि वधू मूल्य तय किया जाता है. वधू मूल्य तय करना – एरे या देखे गए शुभ–अशुभ घटनाओं की चर्चा के पश्चात् होता है. इसके लिए बकरी के सूखे लेड़ी (मेरोम इई) के टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है. इसे साल के पत्तों के दोने में रखा जाता है. इसे रुपयों का नमूना मानते हुए बातचीत प्रारंभ की जाती है. रुपयों की राशि, बैलों की संख्या आदि इसी के द्वारा तय की जाती है.

पहले मूल्य के रूप में दस हजार, बीस हजार, तीस हजार रुपयों की बात हुआ करती थी, बैलों की संख्या भी बीस से कम नहीं होती थी. इसके कारण समाज के संपन्न परिवार के लोग ही आदर्श विवाह या सामाजिक विवाह कर पाते थे. अतः आदिवासी हो समाज महासभा ने इसे गम्भीरता से लिया और सभी स्तर के आर्थिक अवस्था वाले परिवार के युवा युवतियों का शादी –विवाह हो सके इस विचार से वधू का कीमत तय कर दिया गया. जो इस प्रकार है.
(१ ) रूपया – रू० १०१/- ( एक सौ एक रुपया )
(२ ) गाय – एक गाय
(३ ) बैल – एक जोड़ा बैल

आदिवासी हो समाज महासभा के इस निर्णय को हाटगमारिया, चाईबासा, गुइलकेरा, चीटीमीटी, कुचई, आदि स्थानों पर किए गए आम सभाओं में समाज के बुजुर्गों, बुद्धिजीवियों, युवाओं, किसानों, स्कूल कौलेज के छात्र छात्राओं के द्वारा सर्व सम्मति से मान्यता प्रदान किया गया ओर वधू मूल्य का तयशुदा कीमत सभी सहजता पूर्वक अपना रहे हैं. बैठक में तयशुदा रकम पर सहमति न होने तक लोग बैठे रहते हैं, तब तक नाश्ता आदि उन्हें नहीं दिया जाता है. सिर्फ बीड़ी, सिगरेट का प्रयोग करते हैं. सहमति होने के पश्चात् सभी उठते हैं तथा लड़की के घर पर तैयार नाश्ता आदि साथ बैठ कर करते है. इस बीच सुबह ही लड़के वालों तथा अन्य सभी आगन्तुकों को खाने पीने के वस्तुएँ स्टोर से दे दी जाती है. वे अपने से ही अपने कहने पीने की वस्तुओं को तैयार करतें हैं. उसके पश्चात् लोग खाते पीते हैं, आपस में परिचित होते हैं तथा रिश्तों को सुदृढ बनाने पर चर्चा करते है.

लड़के की ओर से आई महिलाएँ होने वाली वधु के लिए लाए गए कपड़े आदि उसे पहना देती है. इन वस्तुओं के ग्रहण करने पर लड़की के द्वरा शादी की सहमति या होने वाले सम्बन्धों की स्वीकृति जाहिर हो जाती है. इस दिन लड़के (वर) भी आकर लड़की को अपने हाथों माता –पिता के सामने कुछ भेंट दे जाते हैं. इस बहाने वे एक दूसरे को आमने सामने देख भी लेते हैं. दूसरे दिन सुबह लड़के पक्ष के लोंगो को विदा किया जाता है. यह कार्यक्रम सुबह किया जाता है. उनको बिदाई के समय चावल, दाल, हडियाँ, आदि सामाग्री भी दिया जाता है. विदाई के समय घर के आंगन में चटाई बिछाया जाता है. चटाई (जाटी) में लड़के पछ के लोगों (बाला को) को बैठा कर हडियाँ, चाय आदि दिया जाता है. (सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में दारू का प्रयोग कभी भी नहीं किया जाता है). उनलोगों के सिर में तेल लगाकर कंघी किया जाता है. हाथ तथा पैरों पर हल्दी तथा तेल लगाया जाता है. उन्हें इस अवसर पर रंग भी लगाया जाता है जो सम्बन्धों का सूचक है. इन्हें फूलों का माला, डूमर (लोवा) गुथा हुआ माला, इत्यादि खुशियों के साथ मनोरंजन करते हुए पहनाया जाता है. माला में कभी भी गंदे एवं अनउपयुक्त वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता.

इसके पश्चात् इनकी विदाई करने के लिए इन्हें रास्ते तक लाया जाता है. फिर दोनों पक्षों के लोग पंक्तियों में एक दूसरे के विपरीत मुखातिब होकर खड़े होते है. लड़के वालों की मुख की दिशा अपने गन्तव्य की ओर तथा लड़की वालों का सामना अपने घर गाँव की ओर होता है. तब लड़की वालों की ओर का एक प्रमुख व्यक्ति कहता है, “बाला को” आपलोग आए, हमलोगों ने दो परिवारों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने, दो गाँवों की दुरियों को मिटाने का शुभ कार्य किया है. आपलोगों को हमलोगों ने भूखा प्यासा भी रखा, जमीन पर सुलाया, इसके लिए हम क्षमा के पात्र हैं. हम शुभ कामना करते हैं कि आपलोग सकुशल खुशी–खुशी घर पहुँचे. इतना कहने के पश्चात् सभी एक दूसरे से हाथ मिला कर विदा होते हैं.

लड़के पक्ष की ओर बापला – इस बार भी दो पक्षों के द्वारा निश्चित किए गए तिथि में, लड़की के पक्ष के लोग उसी तरह निश्चित संख्या में जाते हैं. वहाँ पहुँचने पर उनका स्वगत एवं आदर सत्कार होता है. और खाने पीने तथा रहने कि व्यवस्था पहले के तरह ही की जाती है. दूसरे दिन सुबह पहले की तरह जाटी बिछा कर बिना नाश्ता पानी किए दोनों पक्षों के बुजुर्ग एवं जानकार लोग बैठते हैं. पहले की तरह ही आने के समय देखे गए एरे की चर्चा होती है, और इन्हें लिख लिया जाता है.

इसके पश्चात् यहीं पर वधु मूल्य दिया जाता है. कांसा के एक थाली में रुपयों या सिक्कों को रख कर साफ़ कपड़े में ढक कर लाया जाता है तथा एक किनारे साल पत्ते के दोना में जलता हुआ दिया भी रखा होता है. लड़के पक्ष का एक प्रमुख व्यक्ति लड़की पक्ष के प्रमुख व्यक्ति को सौंपता है. दोनों व्यक्ति मिलकर थाली को पकड़ते है तथा लड़का पक्ष का व्यक्ति कहता है (दिया गया नाम उदाहरण के लिए हैं ) हमलोग आज कानडेसाई गाँव के श्री माटा का लड़का श्री बोटा तथा सरजोमडीह गाँव के श्री टोपे की लड़की, कुमारी चामी का विवाह सम्बन्ध बना रहे हैं. ताकि वे दोनों श्रृष्टि के नियमों के सन्तानोत्पति कर मानव समाज को आगे बढ़ा सके. इसके लिए हम समाज के पंचो के द्वारा, निश्चित किया गया वधु मूल्य का रकम सरजोमडीह गाँव के पंचो को (बाला को) माननीय श्री टोपे को देने हेतू सौंप रहे है. इतना कहने के बाद दोनों मिलकर थाली को ऊपर की ओर उठाते हैं और सिंगबोंगा, देशाउली, नागेएरा बिन्दीएरा, पांहुई जायरा गोवाबोंगा आदि देवी देवताओं को साकी मानकर तीन बार होरी बोल होरी, होरी बोल होरी, होरी बोल होरी, का उच्चारण करते हैं. दोनों पक्षों के बैठे हुए तथा सभी उपस्थित लोग तालियाँ बजाते हैं.

इसके पश्चात् उस थाली को वधु पक्ष की कोई महिला सर पर ढो कर घर के अन्दर ले जाती है.घर के अन्दर ही रुपया गिन कर जिम्मेदार व्यक्ति को सौंप दिया जाता है. इसके पश्चात् दोनों पक्ष के पंच बैलों को देखने जाते हैं. लड़की वालो को उनके लिए प्रस्तावित बैल दिखाया जाता है. पसन्द करने के पश्चात् इन्हें उनके पक्ष के गाउ (गोप) को सौंप दिया जाता है.बैलों को ले जाने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति यानि गाउ की होती है. इस कार्य के लिए गाउ (गोप) को एक हंडियां, चावल दाल आदि खाद्य सामग्री तथा एक धोती दिया जाता है.

यह सब कारवाई करने के पश्चात् सभी खाते पीते हैं. यहाँ भी वधु पक्ष के लोगों तथा अन्य मेहमानों का इन्तजाम पत्तों की झोपडियों (जामडा) में ही किया जाता है. दूसरे दिन विदायी, पहले के समान ही की जाती है. पंचों या बाला लोगों को हल्दी लगाया हुआ धोती–साड़ी बाँध दिया जाता है.

विदायी गुरुवार के दिन नहीं की जाती है. गुरुवार के दिन विदायी अशुभ माना जाता है. गुरुवार को ही जाने की स्थिति में, बुधवार को विदायी का रस्म अदा कर दिया जाता है, फिर उन्हें लौटा कर लाया जाता है. वे लोग रात बिता कर दूसरे दिन सुबह जाते है. इसी प्रकार अमावस्या के दिन भी विदायी नहीं की जाती है.

एरे बोंगा – दोनों तरफ का बापला खत्म होने के पश्चात्, दोनों तरफ लिखे गए एरे का विशलेषण किसी जानकार तथा अनुभवी व्यक्ति के द्वारा कराया जाता है. इसके पश्चात् अशुभ एरे को पूजा के द्वारा खण्डित या समाप्त किया जाता है. एरे पूजा में प्रयुक्त होने वाले सामाग्री दोनों पक्ष के द्वारा मिल कर ख़रीदे जाते हैं. सामर्थ रहते हुए भी एक पक्ष इसे अकेला नहीं खरीदता है. एरे पूजा में बलि होने वाला बोदा या मुर्गा किसी एक रंग का होता है. पूजा के लिए दोनों पक्षों के द्वारा ही दिन, तिथि तथा स्थान तय किया जाता है. पूजा का यह स्थान दोनों (वर तथा वधु के गाँव) के बीच समान दूरी पर, रास्ते के किनारे सुविधा जनक स्थान पर होता है. यहाँ बोदा या मुर्गा की बलि चढ़ा कर पूजा पाठ किया जाता है.

यहाँ पर शादी का दिन निश्चित किया जाता है. शादी के दिन वधु पक्ष के लोगों को दिए जाने वाला चावल की मात्र, हडियाँ की संख्या इत्यादि लोग निश्चित कर देते हैं.

यह सुब प्रेम पूर्वक तय कर लेने के पश्चात् लोग खाते पीते हैं और एक दूसरे से विदा लेते हैं. विदायी के समय दोनों पक्ष के लोग पंक्तियों में खड़े होकर अपने-अपने गन्तव्य दिशा की ओर मुखातिब होते हैं, फिर लड़की पक्ष का एक व्यक्ति लड़के पक्ष के लोगों को सम्बोधन करते हुए कहना आरम्भ करता है, बालाको हमलोग बहुत ही प्रेम पूर्वक आज तक मिलते रहे, आना जाना, खाना पीना होता रहा, पर अब सारा खेल यहीं खत्म करना है. आपलोगों का लड़का हमलोगों को बिल्कुल पसन्द नहीं है, इसलिए आज तक का बना सम्बन्ध हम समाप्त कर रहे हैं. हमलोग अपने सर्वगुण संपन्न, खूबसूरत लड़की आप लोगों के नालायक लड़के के हाथों देना कदापि पसन्द नहीं करेंगे. इसलिए आपलोग अपने लड़के के लिए कोई दूसरी लड़की की तलाश करें, हम अपनी लड़की के लिए भी योग्य वर तलाश करेंगे. इतना कहने के पश्चात् वे अपने अपने मंजिल की दिशा में प्रस्थान करते हैं तथा अपने गाँव का सीमा न आने तक पीछे मुड कर नहीं देखते हैं. (इस तरह का सम्बन्ध अशुभ ग्रहों को खत्म करने तथा अब तक में किसी के द्वारा लगाए गए बुरे नजरों को समाप्त करने के लिए ही की जाती है, न कि सम्बन्ध खत्म करने हेतू.)

विवाह – विवाह की तैयारी काफी जोर शोर से की जाती है. परिवार ही नहीं सारा गाँव इसकी तैयारी में लग जाता है. लोग घर द्वार की सफाई करते हैं. लड़की-लड़के पक्ष के लोग गाँव के घर–घर में धान बाँट देते हैं ताकि चावल की तैयारी हो सके. एक ही घर में हडियाँ की तैयारी संभव नहीं है. अतः शादी विवाह में वर तथा वधु परिवार के लोग नया हन्डी तथा लागत चावल और अन्य सामग्री हडियाँ बनाने हेतू घर-घर में विपरित कर देते हैं.जंगलों से लकडियों का इन्तजाम होता है. महिलाएँ विवाह के अवसर पर उपयोग में आने वाली पत्ती आदि का इन्तजाम स्वेच्छा से, बिना किसी के अनुरोध के ही करती है. सभी इसे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

चूँकि गाँव के प्रत्येक घर परिवार से बापला, शादी-विवाह आदि अवसर पर सामर्थ के अनुसार चावल, दाल, रुपया, खस्सी, मुर्गा, धोती, साड़ी, इत्यादि उस परिवार को दिया जाता है इसलिए सभी परिवार अपने-अपने इन्तजाम में लग जाते हैं. दिए गए वस्तुओं की सूची उस परिवार के रजिस्टर में लिख ली जाती है. इस तरह का रजिस्टर सभी परिवार में होता है. दिए गए वस्तुएँ, उस परिवार में होने वाले इसी तरह के आयोजन के अवसर पर उस परिवार को भी सहायता के रूप में लौटाया जाता है. प्रतिदिन गाँव के बुजुर्ग आपस में बैठकर विवाह की तैयारियों के बारे सलाह मशवरा करते हैं. सभी रिश्तेदारों सम सम्बन्धियों को सूचना एवं निमंत्रण एक माह पूर्व दे दी जाती है ताकि वे भी अपनी तैयारी कर सके.

एक सप्ताह पहले से लड़की तथा लड़के को अपने-अपने घरों पर प्रतिदिन तेल तथा लेप लगाया जाता है. यह लेप गाँव का गोप लड़कियाँ (गाउ ऐरा को) करती है.इस कार्य को करने के लिए उन्हें प्रतिदिन एक लोटा चावल की प्राप्ति होती है. ये महिलाएँ रिश्ते में भाभी, नानी, दादी इत्यादि होती है. एक दो सप्ताह पहले से नाच का अभ्यास प्रारंभ हो जाता है. लोग शादी के नाच का अभ्यास गाजा-बाजा के साथ करते है. शादी के दिन आने में दो दिन बाकी रहने पर लड़की (वधु) अपने बुजुर्ग महिलाओं के साथ निकट सम्बन्धियों के घर जाती है और उनसे व्यक्तिगत रूप से आशिर्वाद प्राप्त करती है. फिर वे अपने मामा घर जाती है. (अगर ममेरा भाई से शादी तय नहीं हुआ हो) और मामा का आशिर्वाद प्राप्त करती है.

मामा घर के लोग शादी में सम्मिलित होने के लिए आने वाले दल-बल के साथ वधु को लेकर उसके मायके आते हैं. शादी के दिन लड़की वाले लड़की को लड़के के घर पहुँचाते हैं. शादी लड़के के घर पर ही होता है.इसे शुभ तथा परम्पराओं के अनुकूल माना जाता है.

ओर एरा – शादी के दिन पहले लड़के की ओर से तीन चार व्यक्ति लड़की वालों के घर प्रस्थान करते हैं.इनके प्रस्थान के समय देशाउली के नाम एक मुर्गा बलि दी जाती है. इनके घर (वधु घर) पहुँचने पर इनका दूतों के समान स्वागत किया जाता है. इनका काम एवं जिम्मेदारी होती है कि लड़की वालों को समय पर प्रस्थान कराएं ताकि शादी के दिन शादी के लिए निश्चित समय पर वे पहुँच सके. साधारणतः ओर-एरा के लोगों की ही जिम्मेदारी होती है कि लड़की के साथ जाने वाले लड़की के सामानों को लड़के के घर पहुंचाए. विवाह के दिन लड़की वाले लड़के के गाँव पहुँचने पर गाँव के किनारे या घर से हट कर थोड़ी दूरी पर किसी छायादार वृक्ष के नीचे, लड़के वालों की ओर से उनके लिए शर्बत, हडियाँ, इत्यादि का इन्तजाम कर दिया जाता है.

थोड़ा सुस्ता लेने के पश्चात् लड़की को गोद में उठाकर महिलाएँ लड़के के घर लाती हैं, जहां आंगन में नई चटाई पूरब पश्चिम के दिशा में बिछा कर रखा जाता है. चटाई बिछे स्थान पर चारों ओर साल के वृक्षों का खम्बा लगा होता होता है तथा ऊपर डालियों से छाया रहता है. उस स्थान से घर के दरवाजे तक सफ़ेद कपड़े का शिलिंग लम्बाई से खीचा हुआ होता है. लड़के और लड़की को चटाई में, पूरब की ओर मुँह करके बिठाया जाता है, और दोनों को हल्दी का लेप लगाया जाता है. वधु तसर की साड़ी पहनती है. हल्दी लगाते समय चटाई के ऊपर दोनों को साल के बने थाली के आकार के पत्तों पर बिठाया जाता है और पैर भी इसी आकार के पत्तों पर रखा होता है.

हल्दी लगाने के पश्चात् एक दूसरे की साड़ी और धोती के छोर को बांध दिया जाता है. लड़के को तीर-धनुष दिया जाता है. लड़का धनुष को कंधे पर रख कर दाहिने हाथ से तीर पकड़ता है और बांये हाथ की छोटी अंगुली से वधु की मांग पर सिंदूर भरता है. लोग तालियाँ बाजा कर खुशियाँ जाहिर करते हैं. दोनों को उठा कर घर के भीतर ले जाया जाता है, फिर बाहर ले लाया जाता है. इस तरह सात बार भीतर-बाहर करके शादी के रस्म को पूरा किया जाता है.

चूँकि शादी के दिन वर वधु दोनों ही उपवास में रहते हैं, इसलिए रस्म की समाप्ति पर दोनों के खाने पीने का इंतजाम किया जाता है. इस आंगन में देशाउली के नाम से मुर्गे की बलि दी जाती है.

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