जन्म संस्कार

सभी धर्म, जाति, समाज के लोगों का अपना-अपना जन्म संस्कार होता है. प्रत्येक समाज में विश्वासों के आधार पर दस्तूर-संस्कार का निर्धारण होता है और इसे व्यवहार में लाकर लोग इन्हें सामाजिक नियमों की संज्ञा देते हैं.

‘हो’ समाज में भी जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न अवसरों के लिए कुछ सामाजिक नियम निर्धारित किये गये हैं. इनका अपना एक सामाजिक महत्त्व है. इन संस्कारों, सामाजिक देवी-देवताओं या कुल के अपने देवताओं से या किन्ही वैज्ञानिक कारणों से किसी ना किसी तरह संबंध होता है.

यहाँ जन्म संस्कार से संबंधित कुछ बातों का वर्णन किया जा रहा है. ये सभी संस्कार मानव की अपनी जातीय एवं सामाजिकता की पहचान देती है. संस्कारों के अनुपालन से समाज ज्यादा संगठित होता है तथा सभी व्यक्ति अपने दायित्वों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक होते हैं.

‘हो’ समाज में संतानोत्पति के लिए स्त्री-पुरुष का वैवाहिक संबंध होना अनिवार्य है. ‘हो’ समाज पितृ प्रधान होता है यानि संतान के पैदा होने पर वह पिता के गोत्र को स्वत: ग्रहण करता है. विवाह के पश्चात स्त्री पुरुष के गोत्र को अपना लेती है. बिना वैवाहिक संबंध के संतानोत्पति को समाज मान्यता नहीं देती और ऐसी संतान को समाज में “लांबी होन” यानि अवैध संतान की संज्ञा दी जाती है. ऐसे संतानों को पिता की सही पहचान नहीं मिलती. उस शिशु को जीवनोपरंत “लांबी होन” शब्द से अपमानित होना पड़ता है.

गर्भवती होने के बाद से ही हो समाज की औरतों को मान्यताओं के आधार पर कुछ नियमों का पालन करना होता है, जैसे –
१) गर्भवती महिला को सूर्यग्रहण/चंद्रग्रहण नहीं देखना होता है. महिला के ग्रहण देखने से होने वाले बच्चे का होंठ कटा होता है या चेहरे पर दाग पड़ जाता है.
२)  गर्भवती महिला या पति को जीव हत्या नहीं करना होता है. ऐसा करने से होने वाले बच्चे का अंग भंग होने या मृत जन्मने की आशंका होती है.
३)  गर्भवती महिला और उसके पति को आपस में या किसी अन्य के साथ लड़ना नहीं चाहिए.
४)  गर्भकाल के दौरान स्त्री को हल या कृषि के अन्य औजारों को नहीं लांघना चाहिए. ऐसा करने पर जन्मने वाले बच्चे की इन्द्रियों पर बुरा असर होने की आशंका होती है.

इस तरह गर्भधारण के दौरान कुछ कार्यों के करने की मनाही होती है. पर पुरुष की किसी भी कृषि या पारिवारिक कार्यों में रोक नहीं होती है. पुरुष खेती-बाड़ी का सारा काम कर सकता है और स्त्री भी शिशु के जनमने तक कुंए से पानी भरने, धान कूटने, जंगल से लकड़ी लाने, चूल्हा-चौका इत्यादि काम करने के लिए स्वतन्त्र है. यह समझा जाता है कि इस दौरान गर्भवती महिला के काम करते रहने से उसका स्वास्थ अच्छा रहता है और शिशु को जनने में ज्यादा तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता.

गर्भवती महिला को प्रसव की पीड़ा जब आरम्भ हो जाती है तो घर के किसी अलग कमरे में उसके सोने की व्यवस्था कर दी जाती है. उसके सहयोग के लिए घर के ही या गाँव के बुजुर्ग एवं जानकर महिलाओं को देख-रेख की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है. ये महिलाएं हर तरह से प्रसूतिका की मदद करती हैं.

बच्चे के जनमने की घड़ी समीप आने पर उस कमरे के दरवाजे के बाएं किनारे तीर-धनुष तथा दायें किनारे बिंडा रख दिया जाता है. रखने वाला (पिता) ग्राम देवता एवं परिवार के पुरखों की आत्माओं को संबोधित करते हुए गुहार लगता है कि आने वाले शिशु, हम तुम्हारे लिए तुम्हारे अनुकूल सामान (औजार या हथियार) रख रहे हैं इस पृथ्वी पर कदम रखने के बाद इन्हीं सामान से समाज को आगे बढ़ाने में योगदान देना है, यही सामान तुम्हें मरने तक साथ देंगे.

शिशु के जनमने के बाद नाभि तथा नाल को काटकर साल के दोने में रखकर घर के पिछवाड़े में जमीन पर गाड़ दिया जाता है. नाभि काटने की यह क्रिया मकई के सूखे पौधे के धारदार छिलके या बांस के धार टुकड़ों से की जाती है. बच्चे के जनमते ही उसे मधु चटाया जाता है ताकि होंठ आपस में न सटे.

शिशु के जनमते ही सिरहाने की ओर खाट या पलंग के दांये किनारे, ग्राम देवता (देशाउलि) एवं परिवार के पुरखों का नाम लेकर तीर के नोक की ओर करके रख दिया जाता है. विश्वास किया जाता है कि इस तीर के द्वारा बच्चे और माँ की सुरक्षा, प्रेतात्माओं तथा बुरे आत्माओं के प्रकोप से होती है. प्रति दिन बच्चे तथा माँ को गरम पानी से घर के पिछवाड़े नहलाया जाता है और तेल की मालिश की जाती है. शिशु के जनमने के पश्चात माता –पिता को अलग ही रहना पड़ता है. उन्हें अछूत (बिषीइ) माना जाता है. वे रसोई कक्ष जिसमें कि पूर्वजों की आत्माओं को प्रतिस्थापित किया होता है, में प्रवेश की मनाही होती है. घर के अन्य सदस्यों तथा बच्चों को भी प्रसूति वाले कमरे में आने-जाने की मनाही हो जाती है. पति ही पत्नी की सेवा-सुश्रुषा करता है तथा एक महिला या दाई जो प्रसूति के समय सहायक थी, कपड़े इत्यादि साफ करने में सहायता करती है. इन लोगों को “नार्ता” तक अछूत ही समझा जाता है. यह बंधन बच्चे के जनमने के नवें दिन यानि नार्ता तक होता है.

नार्ता – यह संस्कार बच्चे के जनमने के दिन नौवें दिन को किया जाता है. इस दिन घर की साफ-सफाई की जाती है. सभी कपड़ों को साफ़ किया जाता है. पानी गरम कर बच्चे तथा माँ को तोपे गये नाभि के स्थान पर बने झोपड़े में नहलाया जाता है.
इस दिन बच्चे के बाल पिता अपने हाथों से काटता है. यह पिता के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण काम होता है. ‘हो’ जाति के संस्कारों के अनुसार नार्ता के दिन शिशु के बाल काटना, उसके पिता होने का सामाजिक परिचय या मान्यता भी होता है.
काटे गये बाल को पिता साल पत्ती के दोने में बटोर कर नहाने हेतु नदी-तालाब की ओर साथ ले जाता है और नदी-तालाब के देवी-देवताओं (नागेएरा – बिंदीएरा) को हल्दी अर्पित करते हुए पानी में बहा देता है. पिता ग्राम देवता (देशाउलि) और नागेएरा – बिंदीएरा से बच्चे की सुरक्षा की कामना करता है तथा उनसे बच्चे को हर प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षा की प्रार्थना करता है. उसके बाद सभी नहा-धोकर घर लौटते हैं और घर के पूर्वजों को, नए बर्तन में बने खाद्य सामग्री पूजने तथा अर्पित करने के बाद –खाना पीना करते हैं. पीछे बनाए गए झोपड़ी को इसी दिन उखाड़ दिया जाता है. इस दिन इनका अछूत का बन्धन समाप्त हो जाता है पर बच्चे की माँ का रसोई कमरे में प्रवेश निषेध ही रहता है. सामर्थ के अनुसार वे सभी काम कर सकते हैं. दूसरे किसी कमरे में खाना बनाना, पानी लाना, पानी देना आदि सारा कार्य कर सकती है. पति भी खेतीबारी या घर के अन्य सभी कार्य स्वातंत्र रूप से कर सकते हैं.

एकशिया – बच्चे के जन्म का यह अंतिम तथा अति महत्पूर्ण संस्कार होता है. इस संस्कार के पश्चात माता पिता पर लगे सभी बन्धन समाप्त हो जाते हैं. इसी दिन बच्चे का नामकरण भी होता है. यानि इसी दिन से बच्चे को उस परिवार के सदस्यता की मान्यता, हो समाज के सदस्यता की मान्यता एवं हो जाति के रूप में प्राप्त होती है.
यह संस्कार बच्चे के जन्मने के तीसवाँ दिन यानि नार्ता के दिन से एकाइसवाँ दिन पर किया जाता है. समझा जाता है कि इस अवधि में माँ के पेट तथा सभी अंगों के रक्तश्राव पुरी तरह सूख जाता है और पूर्णतः शुद्ध तथा पवित्र होकर रसोई कमरे में प्रवेश करने की स्थिति में आ जाती है.

एकशिया के दिन घर भर की साफ़- सफाई अच्छी तरह की जाती है एक नया हंडी में उपवास रहकर हंडिया बनाया जाता है. बच्चे का बाल नाख़ून इत्यादि काटा जाता है, परिवार के अन्य लोग भी नाख़ून और बाल आदि कटवाते हैं. बच्चे के बाल को पिता अपने साथ ले जा कर नदी में बहाते हुए देवी – देवताओं को अर्पित करता है. औरतें भी नदी पोखर में नहाने जाती है बच्चे के सुरक्षा के लिए नदी – पोखरे के देवताओं को हल्दी चढ़ाती है. इस दिन सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है. तालाब या पोखर से नहा धोकर लौटने के पश्चात् बच्चे की माँ को बच्चे के पिता द्वारा दिया गया नया वस्त्र पहनाया जाता है. उसके पश्चात् घर के बुजुर्ग महिला जो उपवास में रहती है नए हंडी में पहले से बनाया गया हंडिया रसोई कमरे में परिवार के पुरखों को अर्पित करती है तथा ग्राम देवता (देशाउली) के नाम से हंडिया का सार द्रव्य (दूलि रासी) अर्पित करते हुए आज के कार्यक्रमों में सम्मिलित होने की प्रार्थना करती है. इसके पश्चात् बच्चे की माँ नए बर्तनों में रसोई कमरे में जाकर खाना वगैरा बनाती है.

इस बीच बच्चे के नामकरण का रस्म पूरा किया जाता है. हो जाति में नामकरण अपने पूर्वजों या वंश के लोगों के नामों पर ही किया जाता है. इसके पीछे पुर्नजन्म सम्बन्धी धारणा तो है ही समाज में जमीन जायदाद में अंश – बंश यानि बंशावली परम्परा भी एक कारण है.
नामंकरण के लिए एक कांसा के बर्तन (बेला) में, हल्का हल्दी मिला पानी लिया जाता है. इसमें दूब घास डाल कर ऊरद एवं अरवा चावल विपरीत दिशाओं में गिराया जाता है. इस दौरान यह प्रक्रिया करने वाले सभी देवी – देवताओं (सिंगबोंगा, देशाउली, पाँहुवी, जायरा, गोंवाबोंगा) को आवहान करते हुए उनकी पूजा अर्चना करता है तथा एक – एक कर उस परिवार के पुरखों या जीवित सभी सदस्यों का नाम लेता हुआ उरद तथा चावल का दाना गिराता है. जिस नाम के लेने से उरद तथा चावल का दाना और दूब घास तीनों एक में सट जाते है तो समझा जाता है कि शिशु के नाम के लिए उस गोत्र के तथा सभी अन्य देवी – देवताओं की रजामंदी उस नाम पर है. उस नाम को लेकर सभी देवी – देवताओं को पुकारते हुए पुजारी “होरी – बोल’’ करता है और बच्चा का नाम निश्चित हो जाता है.

बच्चे का नामाकरण होने के पश्चात् बच्चे को माँ या घर की बुजुर्ग महिला रसोई घर में ले जाती है. रसोई कमरे में या घर के आँगन में हल्का लाल मुर्गा ग्राम देवता के नाम से बलि दिया जाता है. माँ के द्वारा नए बर्तनों में बनाए गए खाद्य सामग्री, ग्राम देवता तथा पुर्वजों के नाम शिशु का परिचय उनसे कराया जाता है. बच्चे को भी उस परिवार के सदस्य के रूप में पहचानने उसकी सुरक्षा करने आदि की प्रार्थना एवं विनती की जाती है.

उसके पश्चात् आँगन में चटाई बिछाकर सभी आमंत्रित महिलाओं को बैठाया जाता है और बच्चे की माँ सबके सिर पर बूंद – बूंद तेल मल देती है. वे महिलाएं भी बच्चे के सिर पर तेल देते हुए बच्चे की लम्बी आयु की कामना करते हुए आशिर्वाद देते हुए भेंट प्रदान करते हैं.
इसके पश्चात् घर में खाने – पीने का आयोजन होता है. सभी आमंत्रित सदस्यों को सामर्थ के अनुसार खाने पीने का इन्तजाम कर दिया जाता है. लोग बच्चे तथा माँ को भेंट देते हैं.

नामाकरण की उपरोक्त विधि में नामाकरण नहीं हो सकने पर बच्चे को किसी इच्छुक सम्बन्धी के नाम पर नाम दिया जाता है. ऐसी परिस्तिथि में उस व्यक्ति के द्वारा साकी सुतम यानि बच्चे को नया परिधान भेंट करता है. बच्चे के बड़े होने तक भेंट करने का यह सिलसिला साल दो साल में चलता रहता है.

अन्य विधि में शिशु जिस दिन जन्मता है उस दिन के नाम के अनुरूप बच्चे का नामकरण होता है. जैसे –सोमवार को जन्म लेने वाले बच्चे का नाम – सोमा, सोल्का, सोमाय, सोंगाह, सोमबारी, इत्यादि रखा जाता है.
मंगलवार को जन्म लेने वाले बच्चे का नाम – मोंगोल, मानी, मोटाय, माना, महाती, इत्यादि रखा जाता है.
बुधवार – बुधू, बुधनी.
गुरुवार – गुरबारी, गुरा, गुरुचरण, इत्यादि.
शुक्रवार – शुरु, सुकरा, इत्यादि.
शनिवार – सुनि, सुनिका, इत्यादि.
रविवार – रुईबारी, राशिका, राबी, इत्यादि रखा जाता है. इस तरह नामकरण के पश्चात् बच्चे के जन्म संस्कार का कार्यक्रम समाप्त हो जाता है.

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