गृह प्रवेश

प्रत्येक समाज में किसी नए घर में प्रवेश करने के लिए उस घर का शुद्धिकरण किया जाता है. ‘हो’ समाज में भी यह प्रथा है. ऐसा समझा जाता है कि उस घर को बनाने में कई लोगों का योगदान रहा और घर बनाने के दौरान घर पर लोगों की अच्छी-बुरी नजर पड़ती रही. भिन्न-भिन्न प्रकार से घर पर गन्दगी या अशुद्धता भी फैलती रही. इसलिए उस घर में रहना आरंभ करने से पहले पूजा-पाठ के द्वारा घर को शुद्ध था रहने लायक बनाया जाता है तथा इस अवसर पर सभी रिश्तेदारों और दोस्तों को आमंत्रित कर खुशियाँ मनाई जाती हैं.

हो समाज में गृह प्रवेश का अपना तरीका है. गृह प्रवेश का दिन निश्चित कर लिया जाता है. गुरुवार एवं शनिवार के दिन गृह-प्रवेश अशुभ माना जाता है. गृह प्रवेश के दिन निमित पूजा पाठ में प्रयोग हेतु नये हांड़ी में शुद्धता के साथ उपवास में रहकर गृहणी हंड़िया तैयार (उटाती) करती है.

निश्चित दिन को घर की लिपाई-पुताई, साफ-सफाई की जाती है तथा आम के पत्तों को रस्सियों में बांधकर चारों तरफ लटका दिया जाता है. उसके पश्चात शुद्धता मे साथ उस गाँव का ग्राम पुजारी उपवास मे में रहकर पूजा करता है. एक नए मटके में हवन के लिए आग जलाया जाता है. पूजा के लिए नारियल, हंड़िया, धुना, सुड़िता, केला, गुड़ आदि सामग्री को उपयोग में लाया जाता है. सर्वप्रथम उस परिवार के पूर्वजों की आत्माओं का आह्वान करते हुए उन्हें हंड़िया अर्पित किया जाता है. इस तरह उन्हें नए घर में प्रतिष्ठापित किया जाता है. फिर देशाउलि या ग्राम देवता के नाम से लाल मुर्गे (आराअ सिम) की बलि देकर देवता का आह्वान किया जाता है. तत्पश्चात मिट्टी के उस नए हांड़ी में हवन करते हुए नए घर के सभी अशुभ एवं लगे हुए बुरी नजर (पंडा पीड़ा) को काटा जाता है.

पूजा ग्राम पुजारी या हो समाज के किसी देवां दिउरी के द्वारा ही कराया जाता है. इस प्रकार पूजा के पश्चात हवन वाले मटके को कहीं जमीन के नीचे गाड़ दिया जाता है तथा लोटे में हल्दी-पानी से आम के पत्तों से सभी कमरों को परिचित किया जाता है. उसके पश्चात घर में नए बर्तनों में खाद्य सामग्री बनाकर प्रतिष्ठापित पूर्वजों की आत्माओं को पूजा के द्वारा अर्पितकर खाने-पीने का आयोजन होता है.

इस तरह गृह प्रवेश या ओवा:-आन्दी का रस्म पूरा किया जाता है. इस अवसर पर लोग गाजा-बाजा के साथ नाचते गाते भी हैं.

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