A Platform for — Bunisness & Marketing Promotion of HOs

‎(FREE ADVERTISE for HOs doing BUSINESS & SERVICES )
A platform for –BUSINESS & MARKETING PROMOTION of HOs in –
HO UPRUM JUMUR BANGALORE 2013 (17 FEB. 2013 )
We are Exhibiting Your Business, Service, Marketing Advertisement FREE of cost in Gathering,
So please make use of it, Your ADVERTISE — SMS WORDS /EMAIL CAN BE SEND IN
PH.NO. 8867747187,
bangaloresakam@gmail.com
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We will make your display. SO YOUR ADVERTISEMENTS ARE WELCOME…INSURANCE AGENTS, DOCTORS, ADVOCATES, BOOK STALLS, CATERERS, BUILDING MATERIALS DEALERS, TRANSPORTATION & TRAVELS, SCHOOLS, COACHING INSTITUTE, TRADITIONAL MARKETING…etc.

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Two Team Needed

Two teams needed according to current situation in our society-
1)EDUCATION & CARRER TEAM (UNDER HO CIVIL SOCIETY)
2)SUGGESTION & ACTIVITY TEAM (IN PROJECT-UPCOMING ITI & PROFESSIONAL COURSE INSTITUTE)

(In Project – UPCOMING ITI & PROFESSIONAL COURSE INSTITUTE, MANOHARPUR, WEST SINGHBHUM)
NEED FROM SOCIETY-LEGAL EXPERTISE, ARCHITECT, MANAGEMENT PEOPLE, INVESTER FOR PROJECT-UPCOMING ITI & PROFESSIONAL COURSE INSTITUTE,MANOHARPUR,WEST SINGHBHUM,

TRUST IS REGISTERED BY MR. BUDHLAL KODA(BHEL TRICHY).

Please Come Forward In Your Own Way (This doesn’t always mean to work in field or asking for money contribution, but can give suggestions/info also. Because every mind counts)

– “HO” CIVIL SOCIETY
(It’s a combination of HO individuals and all HO social groups working regionally)
(It’s under process of formation)
Please call after 9 p.m. (phone-9008727358/8867747187).

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आबुआ दिशुम आबुआ राज

जंगल बचाओ अभियान, NGO, govt organisations के असंख्य अभियान यहाँ फेल हैं इस मामले में. सिर्फ यहाँ नहीं पूरे भारत में यह सिस्टम फेल है. पर यह सिस्टम क्यों फेल है, यह शायद उन लोगों ने नहीं सोचा. आपका कहना बिल्कुल सही है कि बिना स्थानीय लोगों की मूलभूत समस्याओं को जाने इस समस्या का निवारण नहीं हो सकता, लोग पेट के लिये कुछ भी कर सकते हैं. यह काम कोई बाहरी आदमी या संस्था नहीं कर सकती क्योंकि वो स्थानीय लोगों से और उनकी रोजमर्रा से परिचित नहीं हैं. यह काम आप और हम ही कर सकते हैं.

मेरा मानना है कि हम लोगों को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना होगा. हमारे हाथों में हमारे खेत हैं, हमारी जमीन है. हम खेती करना छोड़ क्यों रहे हैं? हमारे पास सब्जियां, फलों के पेड़ या Medicinal plants लगाने, मछली पालन का विकल्प है. हमलोग इतना आत्मनिर्भर हो सकते हैं कि हमें सिर्फ गिनी-चुनी चीजें ही बाजार से खरीदनी होंगी जैसे तेल, नमक, साबुन, कपड़े (?). बाकी चावल, सब्जी, दाल तो हमें हमारे खेत-बागान से ही मिल जायेंगे. अगर हम अपने खेतों की तरफ लौटें तो हमें पता चलेगा कि हमने अपने बहुत सारी समस्याओं का हल निकाल लिया है जैसे –
१) बेरोजगारी की समस्या –
२) शहरों की तरफ पलायन –
३) महंगाई –
४) जंगल पर निर्भरता –

पर खेती करने के लिए हमें सिंचाई की अच्छी व्यवस्था करनी होगी. धान के खेतों में तो बहुत ही ज्यादा पानी चाहिए. इन हालातों में हमें नहरों के जाल की जरूरत होगी पर उसके लिए डैम चाहिए. पर डैम से बहुत से लोग विस्थापित होंगे, गांव, जमीन खतम हो जायेंगे और जंगल भी नहीं रहेंगे. इसलिए डैम शायद अच्छा विकल्प नहीं होगा. हमारे पास और क्या-क्या स्रोत हो सकते हैं सिंचाई के?

– दलहन और सब्जियों के लिए तो बहुत ज्यादा पानी नहीं चाहिए, यहाँ Drip Irrigation या ऐसी ही कोई पद्धति इस्तेमाल हो सकती है. अभी कल ही किसी के फेसबुक प्रोफाइल पर मैंने Drip Irrigation की स्लाइड देखी थी, अभी याद नहीं आ रहा.
– चावल की खेती के लिए बहुत पानी चाहिए. यहाँ मैं थोड़ा अनिश्चित हूँ कि क्या किया जा सकता है. बारिश के पानी का सही उपयोग से बात बन सकती है. अगर बारिश कम हुई तो? क्या हम:-
१) पवनचक्की का इस्तेमाल कर सकते हैं?
२) पानी की टंकियां?

अगर जंगल पर से हमारी निर्भरता कम हुई तो आप देखेंगे कि जंगल और घने हो जायेंगे. बारिश के बादलों को ज्यादा आकर्षित करेंगे और अच्छी वर्षा होगी.

अगर हम पेड़ों की कटाई को कोई समस्या नहीं मानते हैं तो फिर कम बारिश के लिए हमें रोना नहीं चाहिए, नदियाँ सूख रही हैं – नहीं कहना चाहिए, खेती नहीं कर पा रहे – नहीं कहना चाहिए, लोग शहरों को पलायन कर रहे हैं, गांव खाली हो रहे हैं – नहीं कहना चाहिए. हमलोग आदिवासी हैं, हमारा जीवन जंगल, पहाड़, नदी-नालों, खेत-खलिहान के बगैर अधूरा है. इनके बिना हम आदिवासियों का अस्तित्व ही नहीं है. इन मूलभूत चीजों के बगैर हमारी हर लड़ाई बेकार है. हमारी लड़ाई हरी-भरी जमीन के लिए है, न कि बंजर धूल खाती जमीन के लिए है. हम एक भरे पूरे गांव के लिए लड़ रहे हैं, न कि सुनसान गली-मुहल्लों के लिए. ऐसे गांव के लिए क्या लड़ना जहाँ हम खेती ही नहीं कर सकेंगे, जहाँ लोग रहते ही न हों. इससे तो यही अच्छा रहेगा कि डैम बन जाये, कारखाने बन जाएँ, मल्टीप्लेक्स और बहुमंजिला इमारतें बन जाएँ.

एक अच्छा स्वस्थ जंगल वही होता है जहाँ इंसानी दखल कम से कम हो, या बिलकुल न हो. एक अच्छे जंगल में जैविक विविधता होनी चाहिए. हर तरह के जीव जंतु मिलें – केंचुए, गुबरैले, फंगस, पेड़-पौधे और जितना हम सोच सकते हैं. एक अच्छा और स्वस्थ जंगल ही बारिश के बादलों को आकर्षित कर सकता है. हाँ, ऐसे कुछ जंगल हम जरुर बना सकते हैं, जिनसे हम फर्नीचर या जलावन ले सकें. ये जंगल Rotation वाले हों. यानि, एक साल पेड़ लगाने की प्रक्रिया कुछ एकड़ पर, दूसरे साल कुछ और एकड़ पर, तीसरे साल कुछ और इस तरह से दस साल तक हम पेड़ लगाएंगे. और फिर ११ वें साल हम पहले साल वाले पेड़ों की कटाई करेंगे. और इन पेड़ों के खतम होने पर दोबारा वहाँ पेड़ लगाएंगे. १२ वें साल हम दूसरे साल वाले पेड़ काटेंगे और इन पेड़ों के खतम होने पर दोबारा वहाँ पेड़ लगाएंगे. यह प्रक्रिया सालों साल इसी तरह चलती रहेगी.

मछली पालन – मैं लगभग डेढ़ साल पहले सिंद्रुगुई गया था, वहाँ श्री दीपक बिरुवा के बड़े भाई श्री ज्योतिन बिरुवा से भेंट हुई. बातों-बातों में उन्होंने बताया कि उनके एक दोस्त का मछली पालन का व्यवसाय है, जिसमें उनको ६ करोड़ सालाना का शुद्ध लाभ होता है. मुझे लगता है इस व्यवसाय से हमारे लोगों का भविष्य बिलकुल बदल जायेगा.

मैं वन विभाग को देश की सबसे कमजोर संस्था मानता हूँ. इसे शायद बनाया ही इस तरह गया है कि जब जरुरत पड़े तो सरकार जंगल साफ कर लें, चाहे वह क़ानूनी तरीके से हो या गैरकानूनी तरीके से.

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हमारे जंगल खतम हो रहे हैं

हमारे जंगल खतम हो रहे हैं. हमलोगों ने अक्सर आपस में बातें की ही होंगी कि आजकल बारिश कम हो रही है, गर्मी कितनी बढ़ गयी है, मच्छर कितने ज्यादा हो गए हैं आदि आदि. पर वजह जानने की जरुरत हमने महसूस नहीं की. बारिश क्यों कम हो रही है ये हम सब जानते हैं – पेड़ कट रहे हैं, जंगल कम हो रहे हैं, सिकुड़ते ही जा रहे हैं. अच्छा, हमलोगों में से कितने लोगों ने इस साल जंगल का (या चलिए अपने गांव का ही) मशरूम – यानि उड खाया. मशरूम, हम जानते हैं कि जंगल की जमीन पर पेड़ों की पत्तियों के सड़ने से पैदा होती हैं. अब जब जंगल नहीं हैं, पेड़ नहीं हैं तो हमें मशरूम कैसे मिलेगा?

हमलोग अक्सर शिकायत करते हैं कि मच्छर बहुत ज्यादा हो गए हैं. ये भी कम पेड़ों की वजह से हो रहा है. हम लोग जानते हैं कि चमगादड़ मच्छर भी खाते हैं. मैंने कहीं पढ़ा था कि एक चमगादड़ एक घंटे में १००० मच्छर खा जाता है. लेकिन आपने गौर किया कि अब चमगादड़ बहुत कम नजर आ रहे हैं? चमगादड़ विशाल और पुराने पेड़ों जैसे पीपल या इमली के पेड़ों पर रहते हैं. छोटे चमगादड़ इन पेड़ों की कोटरों में रहते हैं. ये पुराने – विशाल पेड़ अब हमारे आस पास नहीं रहे, ये या तो गिर गए या काट दिए गए. इनकी जगह लेने वाले नए पेड़ों को हमने पहले ही काट दिया. अब चमगादड़ों की संख्या घट गयी. इन मच्छर खाने वाले चमगादड़ों की संख्या कम क्या हुई, मच्छरों की आबादी बढ़ गई.

पेड़ों के काटे जाने से बारिश कम हो रही है, जिसकी वजह से मेंढक भी कम हो रहे हैं. इस बार की बारिश में कितने लोगों ने मेंढक का टर्राना सुना है? मैंने तो अभी तक नहीं सुना. मेंढक के टेडपोल मच्छरों के लार्वे खाते हैं. टेडपोल नहीं होने की वजह से मच्छरों के लार्वे पनप कर मच्छर बन जा रहे हैं और हमारी मुसीबत बन रहे हैं.

हमारे लोग महुआ चुनने के लिए पत्तियां जला दिया करते हैं. पत्तियां जलाने भर से ही जंगल का संतुलन बिगड़ जाता है. इन्हीं गिरी हुई पत्तियों में हजारों तरह के कीट, सांप और मेंढक रहते हैं. छोटे पक्षी छोटी झाड़ियों में घोंसले बनाती हैं और उनमें अंडे देती हैं. पत्तियाँ जलाने से ये सारे के सारे जीव खतम हो जायेंगे.

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Johar!

आप सबको सादर जोहार!

आप लोगों की इस वेबसाइट पर की गई प्रतिक्रियाएं पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा. मुझे लग रहा है कि मेरा प्रयास सफल हो रहा है. आप लोगों ने इस वेबसाइट पर मेरी गलतियों को सुधारने में मदद की, जिसके लिये मैं तहेदिल से आप सबका आभारी रहूँगा. आप सब से गुजारिश है कि आगे भी इसी तरह से मार्गदर्शन देते रहें.

‘हो’ समाज के लिये मेरा यह प्रयास आप सबकी मदद के बिना अधूरा है. आप सबसे मेरा निवेदन है कि इस वेबसाइट को एक विराट रूप देने में मेरी मदद करें. जब भी आपको अपने गांवों में जाने अवसर मिलता है, आप अपने कैमरे साथ लेते जाएँ और तस्वीरें खीचें. इस वेबसाइट को ‘हो’ संस्कृति की तस्वीरों की जरुरत है. मैं अकेला इतनी सारी तस्वीरें नहीं जमा कर सकता और इसमें आप लोगों की मदद चाहिए. इस वेबसाइट को ताजातरीन और क्रियाशील बनाए रखने के लिये आपकी मदद की अपेक्षा रखता हूँ.

आप मुझे मेरे ईमेल आईडी hotribe@yahoo.com पर फोटोग्राफ्स भेज सकते हैं. आप मुझे बता सकते हैं कि आप वेबसाइट पर अपना नाम बताना चाहेंगे या नहीं, तस्वीर पर अपना या अपने किसी परिजन का चेहरा दिखाना चाहते हैं या नहीं. इस तरह के फोटोग्राफ पर मैं चेहरे को थोड़ा सा blur कर दूँगा. इसके अलावा अगर आप यह भी बता सकें कि फलां फोटो किस जगह की है और किस विशेष आयोजन का है तो बहुत अच्छा रहेगा.

मेरा अगला लक्ष्य है इस वेबसाइट को अंग्रेजी में बनाना. जैसे ही हिन्दी वाला हिस्सा पूरा हो जाएगा, मैं अंग्रेजी में इसे बनाना शुरु कर दूँगा.

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