मागे पर्व

यह त्योहार फसलों के कटने तथा खेत खलिहान के कार्यों को समाप्त करने के पश्चात माघ महीने के माघ पूर्णिमा को मनाया जाता है.

चूँकि कृषि कार्यों से फुर्सत मिलने के बाद यह त्योहार मनाया जाता है इसलिए इस त्योहार को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस त्योहार की तैयारी महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है. लोग घरों की सफाई, लिपाई-पुताई करते हैं. इस त्योहार में लोग नए कपड़े पहनते हैं. इस त्योहार में ग्राम देवता की पूजा गाजे-बाजे के साथ नाचते-गाते हुए धूम-धाम से की जाती है. चूँकि इस समय सभी खेतों के काम से फुर्सत पा चुके होते है इसलिए लोग सगे-सम्बन्धियों, दोस्तों को आमंत्रित करके खिलाते-पिलाते हैं. मागे परब (पर्व) के समय पूरा गाँव खुशियों से झूम उठता है.

मागे पर्ब को मानाने के पीछे अनेक कहानिया प्रचलित हैं. इनमे नए जगह में गाँव बसाने की कथा भी एक है. हो भाषा में मागे का अर्थ होता है- “माअ् गे” अर्थात “माँ का ही”. इस तरह यह धरती माता का पर्ब है और साथ ही यह गो माता का भी पर्ब है. क्योंकि धरती एवं गो माता का अन्योन्याश्रितता सम्बध है.

मागे पोरोब को मुख्यत: निम्न चरणों (दिनों) में मनाया जाता है;

(1)अनादेर– इस दिन मागे परब का दिन निर्धारित होता है. यह कार्य देशाउली में पूजा-पाट के साथ संपन्न होता है. इसके लिए एक बकरी, लाल मुर्गा, चावल, एवं चावल का आटा इसके लिए जरुरी है. गवाँ के लोग (केवल पुरुष) सामूहिक रूप से इस पर्क्रिया में भाग लेते हैं. इसके एक-दो हफ्ते के अन्दर ही मागे परब मनाया जाता है.

(2) ओतेइली– यह मागे पोरोब (मुख्य: परब) के दो दिन पहले होता है. इस दिन घर के साफ़ सफाई के बाद दिउरी के घर जाया जाता है. दिउरी और उसकी पत्नी को एक जगह बैठा कर उन्हें पूजा स्वरुप हड़िया दी जाती है. इस दिन पूर्वजों को हड़िया चढाई जाती है.

(3) तूमुटु– ओतेइली के दिन ही दिउरी के घर से हड़िया पीने के बाद पुरुष पुरे गाँव घूमते हैं, लकड़ी इकठा करते हैं, और उन्हें एक जगह जमा कर आग लगाई जाती है.

(4) लोयो-गुरि:- मुख्य: परब के एक दिन पहले घर-आँगन (ओवा ओन्ड़ो रचा:) की सफाई होती है, गोबर लगाया जाता है. कपडे साफ़ किये जाते हैं.


(5) मरंग पोरोब– इस दिन (दोपहर के बाद) दिउरी के घर-आँगन में चुरुई बनाई जाती है. दिउरी एवं उसकी पत्नी को तालाब नहाने के लिए ले जाया जाता है. पूजा के लिए जाते समय दिउरी की पत्नी आगे किये रहती है, एवं पूजा के समय भी दिउरी एवं पत्नी एक पंक्ति में रहते हैं. तीन मुर्गे की जरुरत होती है- एक लाल मुर्गा, मियड सुका कलुटी ओन्ड़ो मियडदो हेंदे सिम (काला मुर्गा). पूजा पाट के बाद रातभर नाच गाने का दौर चलता है.

(6) बसि मुसिंग्– मुख्य: परब के एक दिन बाद बसि परब होता है इस दिन दिउरी के घर-आँगन से चुरुई उतारा जाता है दीउरी के साथ पूजा में सहायता के लिए गए सभी लोगो के घर जाया जाता है, एवं घर वाले (कोई एक वरिष्ठ महिला) उनलोगों के सर पर सरसों तेल डालती है एवं खानपान होता है.

(7) हर मगेया– बसि परब के अगले दिन गवाँ से बड़मों (एक तरह के बदमाश भूतों) को भागने का काम होता है. हाथो में डंडे लिए बच्चे- युवक पुरे गावं घूमते हैं, हर घर से कुछ चावल लेकर गावं से थोड़े दूर पर चावल भूंजा जाता है एवं पूजा करके खाया जाता है. इस तरह से मागे परब का समापन हो जाता है.

इन सारे त्योहारों को मनाने के लिए गाजे-बाजे में प्रत्येक त्योहार के लिए अलग-अलग ताल-धुन होते हैं. गानों में त्योहारों का अलग-अलग सुर लय होता है. एक त्योहार में दूसरे त्योहार का नाच नहीं नाचा जाता.

‘हो’ समुदाय प्रकृति की रूपरेखा तथा बदलाव के अनुसार हंसना-रोना नाचना-गाना, चलना जीवन का दस्तूर या रिवाज माना जाता है.

‘हो’ समाज के यही मुख्य त्योहार हैं.

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