बा पर्व

बसंत के मौसम में साल के वृक्षों पर फूल खिलते हैं और डालियाँ इन सफ़ेद फूलों से ढक जाती हैं. बा’, जिसका शाब्दिक अर्थ है – फूल, अर्थात यह बसंत का त्योहार है, जिसमे पवित्र साल वृक्ष (shorea robusta) के फूल को प्रमुखता दी जाती है. बा पर्व तीन दिन मनाया जाता है – सर्वप्रथम बा: गुरि:, दूसरे दिन मरंग बा और अंत में बा बसि.
बा गुरि : बा गुरि: के दिन घर आंगन की गोबर से लिपाई-पुताई की जाती है. उसके उपरांत कपड़े धोने एवं नहाने आदि का कार्यक्रम होता है. घर की औरत शाम को नए घड़े में भोजन तैयार करती है. घर का मुखिया घर और गांव में सुख, समृधि के लिए अदिंग (रसोई घर) में मृतात्माओं, पूर्वजों एवं ग्राम देवता को तैयार भोजन, पानी, हड़िया अर्पित करते हैं. बा गीत के नौ राग होते हैं.

मरंग बा : मरंग बा ही मुख्य पर्व होता है. आज भी घर और आंगन की गोबर से लिपाई की जाती है. गांव का दियुरी (पाहन) उपवास में रहते हैं. स्नानादि से निवृत होकर सहयोगियों के साथ देसाउलि (ग्राम पूजा स्थल) जाते हैं. देसाउलि में हल्दी सिंदूर, अरवा चावल, सखुआ फूल, नए फल एवं लाल मुर्गे की बलि दी जाती है. दियुरी खेतीबारी, पशुधन, गांव को अकाल एवं महामारियों से बचाए रखे इसकी कामना देसाउलि (ग्राम देवता) से करते हैं. ‘हो’ समुदाय में भी सामूहिक रूप से जंगल से सखुआ फूल लेने का रिवाज है. इसके बाद सभी अपने-अपने आंगन में और अदिंग में इसी पूजा को दुहराते हैं.

बा बसि : आज सिर्फ अदिंग को गोबर से लिपा जाता है. आज अंतिम दिन पूर्वजों, मृतात्माओं एवं देवताओं के नाम दाल-भात, हड़िया पानी अर्पित किया जाता है. इसके पश्चात नाच-गान का दौर चलता है. जब तक बा पर्व नहीं होता है, तब तक सखुआ फूल को घर में लाना वर्जित है. इतना ही नहीं, नए फलों का सेवन भी वर्जित है. अगर घर का मुखिया य दियुरी इनका सेवन कर ले तो घर में या गांव में किसी तरह की अशुभ घटना घटती है.

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