गोत्र (किलि)

हो समाज में अनेक गोत्र होते हैं. नीचे कुछेक गोत्रों की सूची दी जा रही है पर इनके अलावे और भी कई गोत्र हैं जो विभिन्न जगहों पर हैं –
अल्डा, अंगारिया, ओमोंग, उजिया, उगुरसंडी, बारदा, बोबोंगा, बांदिया, बारी, बुड़ीउलि, बिरुली, बांडरा, बागे, बोदरा, बिरुवा, बालमुचू, बंकिरा, बोयपाई, बरला, बारजो, बांगसिंह, हेस्सा, हाईबुरु, होनहागा, हेम्ब्रोम, मुंडरी, मारला, मुंडा, मेलगन्डी, मुन्दुइया, इचागुटु, पुरती, गुइया, गगराई, गोडसोरा, गुन्दुवा, पिंगुआ, पाटपिन्गुआ, पाड़ेया, गूंजा, जेराई, जोजो, जोंको, जामुदा, जरिका, कंडेयांग, कोंडन्कल, कलुन्डीया, केराई, कोड़ाअ्, कुन्टिया, कुरली, कुदादाअ्, करोवा, कुंकल, सिंकु, सोय, सुरीन, सुंडी, सरदार (सोरदार), संडील, सामड, सिरका, संवैया, सिजुई, सुम्ब्रुई, चम्पिया, चातोम्बा, चातर, चाकी, देवगम, दिग्गी, दोराईबुरु, दोंगो, तुबिड्, तियु, तिरिया, तामसोय, लागुरी, लुगुन, लेयंगी, लामय.

एक गोत्र के लोगों का आपस में विवाह पूर्णतया वर्जित है. इसे किसी भी रूप में स्वीकारा नहीं जाता और दंडनीय है. आपस में सामाजिक विवाह में वर्जित गोत्र –
१) तुबिड – बुड़ीउलि – कुदादाअ्
२) सुम्ब्रुई – सुरीन
३) तामसोय – सोय – तिरिया – पाड़ेया
४) गगराई – सिंकु – जेराई
५) बोदरा – मुंडरी
६) संवैया – बारी – अल्डा – कलुन्डीया
७) तियु – बांडरा

इस तरह के बहुत से गोत्र एक दूसरे गोत्र से भी सामाजिक विवाह का संबंध नहीं करते हैं. वे दूसरे गोत्र को भी समान गोत्र (हागा) मानते हैं.

समझा जाता है कि ऐसे विभिन्न गोत्रों का उदगम एक ही गोत्र था या ऐसे गोत्रों के बुजुर्गों ने आपस में माप के साथ यह तय किया होगा कि हमलोग तथा हमारे गोत्र के लोग आपस में कभी संबंध स्थापित नहीं करेंगे.

‘हो’ समाज में पुरातन समय से प्रचलित नाम चले आया रहे हैं जो उसी वंश में लगातार चलते आ रहे हैं. इन नामों से ही गोत्र मे बिना भी पहचान हो जाती है कि अमुक व्यक्ति हो जाति का ही है. अमूमन तीन अक्षरों का नाम प्रचलित होता है. जैसे, पुरुषों के नाम मुख्यतः इस प्रकार होते हैं –
माटा, मुटु, डूका, चोकरो, हेंदे, सोना, बागुन, लाको, पुन्डी, परदन, मोंगोल, गंगा, जेंगा, जेना, जम्बिरा, पाइकराय, जुकडू, डेबरा, मथुरा, अंकुरा, सेलाय, काटे, दुम्बी, दुलू, बेगरा, बुधू, बाटे, मुधू, मानकी, लेबेया, मोटा, मुकरु, चोरोन, कांडे, सामू, सागू, डूका, दुरगा, कानू, गुरा, तुरम, सिंगा इत्यादि.

महिलाओं के प्रचलित नाम –
मेचो, जिंगी, मेंजो, सोमबारी, जाम्बी, रानी, सुकु, बाहमई, मालती, चेपो, जानकी, सुरु, बालेमा, बाहलेन, पुन्डीमई, हेंदेमई, लखमी इत्यादि.

इन छोटे नामों के प्रचलन का सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व है. एक तो उच्चारण या पुकारने में आसानी होती है. परिवार के किसी भी पूजा-पाठ में उस परिवार के उस वंश के सारे पुरखों का नाम लिया जाता है, इससे नाम लेने में, नाम याद रखने में आसानी होती है.

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